माननीय मुख्यमंत्री जी का संदेश

प्रिय आत्मन,

आदि शंकराचार्य जी का दर्शन सम्पूर्ण विश्व को भिन्नताओं से परे एक सूत्र में बांधने का दर्शन है. मैं समाज के हर वर्ग के लोगों का आव्हान करता हूं कि वे आदि शंकराचार्य की पावन स्मृति में 19 दिसम्बर, 2017 से 22 जनवरी, 2018 तक चलने वाली "एकात्म यात्रा" के सहभागी बनें एवं उनके शाश्वत दर्शन को जीवन में आत्मसात करें | मेरा दृढ़ मत है कि इससे श्रेष्ठ व्यक्ति, समाज, राष्ट्र एवं विश्व का निर्माण होगा |
मध्य प्रदेश शासन द्वारा आदि शंकराचार्य की प्रतिमा के लिए सांकेतिक धातु संग्रहण एवं जनजागरण अभियान में हम सब सहभागी बनें | भारत की सांस्कृतिक, धार्मिक और अध्यात्मिक एकता में उनके अखण्ड योगदान के लिए हमारा यही प्रतिदान होगा |

आपका
शिवराज सिंह चौहान

एकात्म यात्रा की जानकारी

जगदगुरु आदि शंकराचार्य जी के बारे में

आदि शंकराचार्य अद्वैत वेदांत के प्रणेता थे। उनके विचारोपदेश आत्मा और परमात्मा की एकरूपता पर आधारित हैं जिसके अनुसार परमात्मा एक ही समय में सगुण और निर्गुण दोनों ही स्वरूपों में रहता है। स्मार्त संप्रदाय में आदि शंकराचार्य को शिव का अवतार माना जाता है। इन्होंने ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, मांडूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, बृहदारण्यक और छान्दोग्योपनिषद् पर भाष्य लिखा। वेदों में लिखे ज्ञान को एकमात्र ईश्वर को संबोधित समझा और उसका प्रचार तथा वार्ता पूरे भारत में की। आचार्य शंकर का जन्म वैशाख शुक्ल पंचमी तिथि ई. सन् ७८८ को तथा मोक्ष ई. सन् ८२० स्वीकार किया जाता है, परंतु सुधन्वा जो कि शंकर के समकालीन थे, उनके ताम्रपत्र अभिलेख में शंकर का जन्म युधिष्ठिराब्द २६३१ शक् (५०७ ई०पू०) तथा शिवलोक गमन युधिष्ठिराब्द २६६३ शक् (४७५ ई०पू०) सर्वमान्य है। शंकर दिग्विजय, शंकरविजयविलास, शंकरजय आदि ग्रन्थों में उनके जीवन से सम्बन्धित तथ्य उद्घाटित होते हैं। दक्षिण भारत के केरल राज्य (तत्कालीन मालाबारप्रांत) में आद्य शंकराचार्य जी का जन्म हुआ था। उनके पिता शिव गुरु तैत्तिरीय शाखा के यजुर्वेदी ब्राह्मण थे। भारतीय प्राच्य परम्परा में आद्यशंकराचार्य को शिव का अवतार स्वीकार किया जाता है।


एकात्म यात्रा के पर्व एवं तिथियाँ

एकात्म यात्रा मार्ग का विवरण